भविष्यपुराण के अनुसार सर्पो के लक्षण और स्वरूप :
सर्प को को एक मुँह दो दांत और विष से भरी हुई चार दाढ़े होती है । उन दाढ़ोके नाम मकरी, कराली , कालरात्री और यमदूती है । इनके क्रमश ब्रम्हा ,विष्णु , रूद्र और यम ये चार देवता है यमदूती नाम की दाढ़ सबसे छोटी होती है । इस से सर्प काटता है तो वह उसी पल मर जाता है इस पर कोई मंत्र ,औषधी का असर नहीं होता है मकरी दाढ़ का चिन्ह शस्त्र के समान, करालिका काक के पैर के सामान तथा कालरात्रिका हाथ के समान चिन्ह होता है । और यमदूती कूर्म के समान होती है सफेद , रक्त ,पित और कृष्ण - इन डाढो के रंग होते है । इन का वर्ण क्रमश ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र है सर्प की दाढ़ों में सदा विष नहीं रहता दाहिने नेत्र के समीप विष रहने का स्थान होता क्रोध करने पर विष पहले मस्तक के पास जाता है , मस्तक के धमनी और फिर नाड़ियोके से दाढ़ में पहुँच जाता है । आढ़ कारण से साप काटता है - दबनसे , पहेलके वैरसे , भयसे, मदसे , भूखसे , विष का वेग होने से , संतानकी रक्षाके लिए तथा काल की प्रेरणा से जब सर्प काटते ही पेट और उलट जाता है । और उसकी डाढ़ टेढ़ी होती है तो तब उसे दबा हुआ समझना चाहिये । जिस के काट से बहुत बड़ा घाव हो जाय तो द्वेष से काटा है , ऐसा समझना चाहिये एक दाढ़ का चिन्ह हो और भलीभाति दिखाई न दे तो भय से काटा समझना चाहिये इस प्रकार रेखा की तरफ दाढ़ दिखायी दे तो मदसे काटा हुआ दो दाढ़ दिखायी दे बड़ा घाव बन जाय तो भूख से काटा हुआ दो दाढ़ दिखायी दे और घाव में रक्त हो जाय तो विष वेग से काटा हुआ , और दाढ़ दिखायी दे और घाव दिखायी न दे तो संतान की रक्षा के लिये काटा हुआ मानना चाहिये काक के पैरकी तरह तीन दाढ़ गहरे दिखायी दे या चार दाढ़ दिखायी दे तो काल की प्रेरणा से काटा हुआ समझना चाहिये यह असाद्य है और इस कोई दवा नहीं है ।
सर्प को को एक मुँह दो दांत और विष से भरी हुई चार दाढ़े होती है । उन दाढ़ोके नाम मकरी, कराली , कालरात्री और यमदूती है । इनके क्रमश ब्रम्हा ,विष्णु , रूद्र और यम ये चार देवता है यमदूती नाम की दाढ़ सबसे छोटी होती है । इस से सर्प काटता है तो वह उसी पल मर जाता है इस पर कोई मंत्र ,औषधी का असर नहीं होता है मकरी दाढ़ का चिन्ह शस्त्र के समान, करालिका काक के पैर के सामान तथा कालरात्रिका हाथ के समान चिन्ह होता है । और यमदूती कूर्म के समान होती है सफेद , रक्त ,पित और कृष्ण - इन डाढो के रंग होते है । इन का वर्ण क्रमश ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र है सर्प की दाढ़ों में सदा विष नहीं रहता दाहिने नेत्र के समीप विष रहने का स्थान होता क्रोध करने पर विष पहले मस्तक के पास जाता है , मस्तक के धमनी और फिर नाड़ियोके से दाढ़ में पहुँच जाता है । आढ़ कारण से साप काटता है - दबनसे , पहेलके वैरसे , भयसे, मदसे , भूखसे , विष का वेग होने से , संतानकी रक्षाके लिए तथा काल की प्रेरणा से जब सर्प काटते ही पेट और उलट जाता है । और उसकी डाढ़ टेढ़ी होती है तो तब उसे दबा हुआ समझना चाहिये । जिस के काट से बहुत बड़ा घाव हो जाय तो द्वेष से काटा है , ऐसा समझना चाहिये एक दाढ़ का चिन्ह हो और भलीभाति दिखाई न दे तो भय से काटा समझना चाहिये इस प्रकार रेखा की तरफ दाढ़ दिखायी दे तो मदसे काटा हुआ दो दाढ़ दिखायी दे बड़ा घाव बन जाय तो भूख से काटा हुआ दो दाढ़ दिखायी दे और घाव में रक्त हो जाय तो विष वेग से काटा हुआ , और दाढ़ दिखायी दे और घाव दिखायी न दे तो संतान की रक्षा के लिये काटा हुआ मानना चाहिये काक के पैरकी तरह तीन दाढ़ गहरे दिखायी दे या चार दाढ़ दिखायी दे तो काल की प्रेरणा से काटा हुआ समझना चाहिये यह असाद्य है और इस कोई दवा नहीं है ।

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