गरुड़ पुराण अनुसार नरकों के स्वरूप और प्रकार :



        

               गरुड़ पुराण में तो हजारो नर्क बताये है पर उसमे मुख्य नरक इस प्रकार है ' रौरव ' नामका नरक अन्य सभी में प्रधान  है  झूढी गवाही और जुढ बोलने वाले  रौरव नरक में जाते है  इस का विस्तार दो हजार योजन है   एक योजन १३ से १ ६  किमी जितना विस्तार होता है घुटने वहा दुस्तर गड्ढा है   दहकते हुए  अंगारोसे  भरा हुआ वह गड्ढा पृथ्वी के समान बराबर  ( समतल  भूमि - जेसा ) दिखता  है तीव्र  अग्नि से वहा की भूमि तप्तााङ्गकार -जैसी है उस में यम के दुत पापियों को डाल देते है । उस जलती हुई अग्नि में पापी इधर - उधर  भाग ते  है   उसके पैर में छाले पड़ जाते है जो फुट के बहने लगते है रात -दिन वहा पापी पैर उठा  -उठाकर चलते है  इस प्रकार वह जब  हजारो योजन पार कर  लेते  है तब उस पापियों को दूसरे नरक में भेज देते है इस प्रकार मेने आपको रौरव नरक बात कही अब  महारौरव  नामका नरक की बात सुनो  यह नरक पांच हजार योजन में फैला हुआ है  वहा की भूमि तांबे के समान वर्णवाली है  उसके नीचे अग्नि जलती रहती है वह भूमि  विधुत-प्रभा के समान क्रांतिमान है  देखने में वह पापियों को भयकर प्रतीत होती है यमदूत पापियों को हाथ -पैर  बांधकर उसी में लुढ़का देते है और वह लुढ़कता हुआ उसमे चला जाता है मार्ग में कौआ ,बगुला, भेड़िया ,मच्छर  और  बिच्छू  क्रोधातुर  हो कर उसे खाने  के लिये तत्पर रहते है  वह उस जलती हिए भूमि तथा  जीव-जंतु के आक्रमण से दुखी हो जाते है की उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है इस प्रकार कष्ट भोग कर वो बेचेन हो जाते है  इस  नरकलोक में हजारो वर्ष गुजर जाते तब कही जाकर मुक्ति प्राप्त होती है 
                इसके बाद जो नरक है उसका नाम ' अतिशत 'है  वह स्वभावतः अतयन्त  शीतल है महारौरव नरक के सामने इसका विस्तार भी बहुत लंबा है वह गहन अंधकार से व्याप्त है  असह्य  कष्ट देनेवाले यमदूतोके द्रारा  पापीजनों  लाकर बाँध दिये जाते है   अतः  वे एक दूसरे को आलिंगन करके वहाँकी  भयकर ढंडक से बचने का प्रयास करते है उनका शरीर ठंडकसे काँपने लगता है   वहाँ हिमखण्ड का वहन  करनेवाली वायु  चलती है , जो हड़ियो को तोड़ देती है  जो लोग असंख्य  पाप करता  है , इस  वह इस नरकके  अतिरिक्त  ' निकृन्तन '  नामसे  प्रसिद्व  दूसरे नरकमें जाता है वहाँ  अनवरत  कुंभकार  के समान चक्र चलते रहते है जिनके ऊपर पापीजनों को खड़ा कर के सिर से लेकर पैर तक छेदा जाता है  फिर भी उनका प्राणान्त  नहीं होता है   उनके शरीर के भाग सेकड़ो बार टूट जाते है और फिर जुड़ जाते है  जबतक हजारो वर्ष पुरे न हो जाते , तब तक वह रुकता नहीं  जो लोग उस चक्रपर बाँधे जाते है वे जलके घटकी भांति उस पर घूमते रहते है अब   में  आप को 'असिपत्रवन ' नामक दूसरे नरक के विषय में सुनो  यह नरक एक हजार योजनमें  फैला हुआ है   इसकी  संपूर्ण  भूमि अग्निसे  व्याप्त होने कारण सदा जलती रहती है  इस भयकर नरक में सात -सात सूर्य  अपनी सहस्त्र-सहस्त्र  रश्मियों के साथ सदैव तपते रहते है, जिनके संतापसे  वहाँके पापी हर  क्षण  जलते  रहते है 
          असिपत्रवन नामक नरक के बारे में बताया अब महा भयानक  तप्तकुंंभ नरक के बारे में सुनो - इस में  चारो और अत्यंत गरम घड़े है उनके चारो और अग्नि  प्रज्वलित रहती है , वे  उबलते हुए तेल  और  लौहेके चूर्णसे  भरे रहते है   पापियों के ले जाकर वहाँ आधे मुँह डाल दिया जाता है  यमदूत  नुकिले  हथियारों से उन पापियोंकी  खोपड़ी , आँखो  तथा हडियो को छेद - छेदकर नष्ट करते है उसके बाद  यमदूत उन पापियों के  सिर , स्नायु  मांस त्वचा आदिको जल्दी - जल्दी करछुले  से उसी  तेल में घुमाते हुये उन पापियों को काढ़ा बना डालते है  इस
नरको भिन्न - भिन्न  प्रकार है 
       

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